Ziyarat E Nahiya In Hindi Updated

इसे पढ़ने से हमारे मौजूदा इमाम के प्रति हमारी वफ़ादारी और मोहब्बत गहरी होती है।

امام حسینؑ کے چہلم کے موقع پر۔

Disclaimer: यह एक जानकारीपूर्ण लेख है। धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रामाणिक मौलानाओं या किताबों का संदर्भ लें।

of Karbala and, in some versions, the names of their killers. 2. Themes and Content

'ज़ियारत' (Ziyarat) अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'सन्दर्शन करना', 'दीदार करना' या किसी पवित्र स्थल की यात्रा करना। इस्लामी परंपरा में, इसका प्रयोग विशेष रूप से पैगम्बरों, इमामों और उनके अनुयायियों की कब्रों या पवित्र स्थानों पर जाकर उन्हें सलाम करने और उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए किया जाता है। ziyarat e nahiya in hindi

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"सलाम हो उन गहरे घावों पर जिनसे खून का फव्वारा जारी था।"

"Falan dabhoka atshana..." "پس انہوں نے آپ کو پیاسا ذبح کیا۔ آپ کو خاک پر تڑپتا ہوا چھوڑ دیا۔ آپ کے خیموں کو لوٹا گیا اور اہل بیتؑ کو قیدی بنایا گیا۔" امامِ زمانہؑ فرماتے ہیں:

"ज़ियारत-ए-नाहिया" एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है "शोकग्रस्त क्षेत्र की यात्रा" या "शोक और पीड़ा की ज़ियारत।" यह विशेष रूप से इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रेम और उनके अहलेबैत (अ.स.) के दर्द को दर्शाती है। This link or copies made by others cannot be deleted

इसे बारहवें इमाम, इमाम मोहम्मद इब्न अल-हसन अल-महदी (अ.स.) द्वारा संकलित माना जाता है।

"ऐ सलाम हो तुम पर, ऐ अबा अब्दिल्लाह अल-हुसैन (अ.स.)! ऐ मेरे पिता के पिता और ऐ सच्चे इमामों की निगाहों की ठंडक!"

अल्लाह से गुनाहों की माफ़ी और इमाम के मिशन का हिस्सा बनने की प्रार्थना। निष्कर्ष

امام حسینؑ پر سلام (Salutations to Imam Hussain) Try again later

यह ज़ियारत साल के किसी भी दिन और किसी भी समय पढ़ी जा सकती है, लेकिन परंपरा के अनुसार:

زیارتِ ناحیہ صرف ایک دعا یا زیارت نہیں ہے، بلکہ یہ کربلا کی تاریخ کا وہ آئینہ ہے جسے خود معصومؑ نے ہمارے سامنے رکھا ہے۔ ہندی اور رومن ہندی میں اس زیارت کو سمجھ کر پڑھنے سے ہم کربلا کے حقیقی پیغام اور امامِ وقت کے دل کے درد کو محسوس کر سکتے ہیں۔ اگر آپ اپنے موبائل یا کتاب میں تلاش کر رہے ہیں، تو کوشش کریں کہ اس کے ترجمے پر غور کریں تاکہ آپ کے دل میں امام حسینؑ کی محبت اور امامِ زمانہؑ کے ظہور کی تڑپ مزید گہری ہو سکے۔ If you would like to proceed, please let me know:

इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के बाद उनके मुबारक सर को नेज़े (भाले) पर बुलंद किया गया, इमाम महदी इस मंज़र पर सलाम भेजते हैं।

"अगरचे ज़माने ने मुझे देर से पैदा किया और मैं कर्बला में आपकी मदद न कर सका... तो मैं सुबह व शाम आपके दुःख में आंसू बहाता हूँ। और अगर मेरे आंसू सूख जाएं, तो मैं आंसुओं की जगह खून के आंसू रोऊंगा।"

ज़ियारत-ए-नाहिया का ऐतिहासिक संदर्भ

"ऐ अल्लाह! मेरे इमाम के खून का बदला ले और हमें उनके चाहने वालों में शुमार कर।"